ads

महाभारत से जुड़ा है गोवर्धन पर्वत का इतिहास , श्रीकृष्ण ने शुरू करवाई थी इसकी पूजा

जीवन मंत्र डेस्क। सोमवार, 28 अक्टूबर को कार्तिक मास के शुक्ल पक्ष की प्रतिपदा है। इस तिथि पर गोवर्धन पर्वत की पूजा विशेष रूप से की जाती है। इसे गिरीराजजी भी कहा जाता है। गोवर्धन पर्वत का इतिहास महाभारत से जुड़ा है। ये पर्वत मथुरा के पास स्थित है। द्वापर युग में श्रीकृष्ण ने गोकुल-वृंदावन के लोगों को गोवर्धन पर्वत की पूजा करने के लिए प्रेरित किया था। तभी से भक्तों द्वारा इस पर्वत की पूजा की जा रही है। इस पर्वत को एक ऋषि ने तिल-तिल घटने का शाप दिया था। जानिए पुलस्त्य ऋषि और गोवर्धन पर्वत से जुड़ी कथा...

  • कथा के अनुसार पुराने समय में तीर्थ यात्रा करते हुए पुलस्त्यजी ऋषि गोवर्धन पर्वत के पास पहुंचे तो इसकी सुंदरता देखकर वे मंत्रमुग्ध हो गए और द्रोणाचल पर्वत से निवेदन किया कि मैं काशी में रहता हूं। आप अपने पुत्र गोवर्धन को मुझे दे दीजिए, मैं उसे काशी में स्थापित कर वहीं रहकर इसकी पूजा करूंगा।
  • द्रोणाचल पर्वत अपने पुत्र गोवर्धन के लिए दुखी हो रहे थे, लेकिन गोवर्धन पर्वत ने ऋषि से कहा कि मैं आपके साथ चलुंगा, लेकिन मेरी एक शर्त है। आप मुझे जहां रख देंगे, मैं वहीं स्थापित हो जाऊंगा। पुलस्त्यजी ने गोवर्धन की यह बात मान ली। गोवर्धन ने ऋषि से कहा कि मैं दो योजन ऊंचा और पांच योजन चौड़ा हूं। आप मुझे काशी कैसे ले जाएंगे?
  • पुलस्त्य ऋषि ने कहा कि मैं अपने तपोबल से तुम्हें अपनी हथेली पर उठाकर ले जाऊंगा। तब गोवर्धन पर्वत ऋषि के साथ चलने के लिए सहमत हो गए। रास्ते में ब्रज भूमि आई। उसे देखकर गोवर्धन सोचने लगा कि भगवान श्रीकृष्ण यहां बाल्यकाल और किशोरकाल की बहुत सी लीलाएं करेंगे। अगर मैं यहीं रह जाऊं तो उनकी लीलाओं को देख सकूंगा। ये सोचकर गोवर्धन पर्वत पुलस्त्य ऋषि के हाथों में और अधिक भारी हो गया।
  • ऋषि को विश्राम करने की आवश्यकता महसूस हुई। इसके बाद ऋषि ने गोवर्धन पर्वत को ब्रज में रखकर विश्राम करने लगे। ऋषि ये बात भूल गए थे कि उन्हें गोवर्धन पर्वत को कहीं रखना नहीं है। कुछ देर बाद ऋषि पर्वत को वापस उठाने लगे लेकिन गोवर्धन ने कहा कि ऋषिवर अब मैं यहां से कहीं नहीं जा सकता। मैंने आपसे पहले ही आग्रह किया था कि आप मुझे जहां रख देंगे, मैं वहीं स्थापित हो जाउंगा। तब पुलस्त्यजी उसे ले जाने की हठ करने लगे, लेकिन गोवर्धन वहां से नहीं हिला। तब ऋषि ने उसे श्राप दिया कि तुमने मेरे मनोरथ को पूर्ण नहीं होने दिया, अत: आज से प्रतिदिन तिल-तिल कर तुम्हारा क्षरण होता जाएगा। फिर एक दिन तुम धरती में समाहित हो जाओगे। तभी से गोवर्धन पर्वत तिल-तिल करके धरती में समा रहा है। कलियुग के अंत तक यह धरती में पूरा समा जाएगा।

भगवान श्रीकृष्ण ने इसी पर्वत को इन्द्र का मान मर्दन करने के लिएअपनी सबसे छोटी उंगली पर तीन दिनों तक उठा कर रखा था और सभी वृंदावन वासियों की रक्षा इंद्र के कोप से की थी।



Download Dainik Bhaskar App to read Latest Hindi News Today
goverdhan puja, story of goverdhan parvat, mathura tirth, goverdhan parikrama


source https://www.bhaskar.com/religion/dharam/goverdhan-puja-story-of-goverdhan-parvat-mathura-tirth-goverdhan-parikrama-01674269.html
SHARE

Milan Tomic

Hi. I’m Designer of Blog Magic. I’m CEO/Founder of ThemeXpose. I’m Creative Art Director, Web Designer, UI/UX Designer, Interaction Designer, Industrial Designer, Web Developer, Business Enthusiast, StartUp Enthusiast, Speaker, Writer and Photographer. Inspired to make things looks better.

  • Image
  • Image
  • Image
  • Image
  • Image
    Blogger Comment
    Facebook Comment

0 comments:

Post a Comment