जीवन मंत्र डेस्क। बुधवार, 25 दिसंबर को ईसाई धर्म का सबसे खास पर्व है क्रिसमस। इसी तारीख पर प्रभु यीशु का जन्म इजराइल के येरूशेलम में हुआ था। दुनियाभर में 25 दिसबंर को प्रभु यीशु का जन्मदिन मनाया जाता है और इसके लिए कई तरह की परंपराएं प्रचलित हैं। ईसाई धर्म को मानने वाले लोग क्रिसमस पर अपने घर को सजाते हैं। घर में खासतौर पर क्रिसमस ट्री सजाया जाता है। लोग सांता क्लॉज की तरह तैयार होते हैं। अपने करीबियों को क्रिसमस की शुभकामनाएं देने के लिए कार्ड्स दिए जाते हैं। जानिए इन परंपराओं से जुड़ी खास बातें...

क्यों सजाते हैं क्रिसमस ट्री
क्रिसमस पर खास तरह का वृक्ष सजाया जाता है। ये वृक्ष सदाबहार डगलस, बालसम या फर का होता है। इस पर रंग-बिरंगी लाइट्स लगाई जाती हैं, घंटियां बांधी जाती हैं, हार-फूलों से और अन्य सुंदर चीजों से सजाया जाता है। इस ट्री के संबंध में कहा जाता है कि जिन घरों में ये पेड़ होता है, वहां नकारात्मकता नहीं रहती है। मान्यता है कि इस वृक्ष को सजाने की परंपरा जर्मनी से शुरू हुई थी। जब ईसा मसीह का जन्म हुआ तो देवताओं ने उनके माता-पिता को बधाई दी थी। इसके लिए देवताओं ने एक सदाबहार फर को सितारों से सजाया था। उसी दिन से हर साल सदाबहार फर के पेड़ को क्रिसमस ट्री के प्रतीक के रूप में सजाते हैं। इसकी शुरुआत करने वाला पहला व्यक्ति बोनिफेंस टुयो नामक एक अंग्रेज धर्म प्रचारक था।

- क्रिसमस ट्री मुख्य द्वार के दाहिनी ओर रखना चाहिए। इसकी सजावट में उन चीजों का उपयोग करना चाहिए जो हमें पसंद हैं। इससे हमारे जीवन में सुख-समृद्धि बढ़ती है।
- इंग्लैंड में किसी के जन्मदिन, विवाह या किसी की मृत्यु पर क्रिसमस ट्री लगाने की परंपरा है। ये पेड़ लगाते समय सुखद जीवन की कामना की जाती है।
- क्रिसमस ट्री के संबंध में मान्यता प्रचलित है कि ये वृक्ष आदम के बाग में भी लगा था। उस समय हव्वा ने इसका फल तोड़ लिया था। जबकि परमेश्वर ने इस वृक्ष के फल तोड़ने के लिए मना किया था। इसके बाद इस पेड़ की पत्तियां सिकुड़ गई और नुकली हो गईं और इसकी वृद्धि रुक गई। जब ईसा मसीन का जन्म हुआ तो ये वृक्ष फिर से बढ़ने लगा।
- 16वीं सदी में जर्मनी में जब भी आदम और हव्वा का नाटक होता था, तब फर के वृक्ष लगाए जाते थे। स्टेज पर पिरामिड भी रखा जाता था और सितारा लगाया जाता था। समय के साथ पिरामिड और फर का वृक्ष एक हो गए और इस वृक्ष का नाम क्रिसमस ट्री पड़ गया।

संत निकोलस थे असली सांता
क्रिसमस पर सांता क्लॉज का भी विशेष महत्व है। सांता क्लॉज से जुड़ी मान्यता के अनुसार इनका घर उत्तरी ध्रुव पर है और वे उड़ने वाले रेनडियर्स गाड़ी पर चलते हैं। सांता का आधुनिक रूप 19 वीं सदी से प्रचिलत है, इससे पहले सांता का ऐसा स्वरूप नहीं था। करीब डेढ़ हजार साल पहले निकोलस नाम के संत का जन्म हुआ था। संत निकोलस को ही असली सांता और सांता का जनक माना जाता है।
- संत निकोलस का जन्म एक धनी परिवार में तीसरी सदी में जीसस की मृत्यु के करीब 280 साल बाद हुआ था। इनके बचपन में ही माता-पिता की मृत्यु हो गई।
- शुरू से ही निकोलस प्रभु यीशु के भक्त थे। बड़े होकर वे ईसाई धर्म के पादरी बने। बाद में वे बिशप बन गए। संत निकोलस को जरूरतमंद लोगों और बच्चों को उपहार देना बहुत पसंद था।
- संत निकोलस अपनेउपहार आधी रात में ही बांटते थे, क्योंकि वे अपनी पहचान गुप्त रखना चाहते थे।
- सांता के आधुनिक स्वरूप में वे मोटे, हंसमुख, सफेद दाढ़ी वाले थे। सांता हमेशा सफेद कॉलर वाला लाल कोट पहनते थे। यही स्वरूप आज प्रसिद्ध है।
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source https://www.bhaskar.com/religion/jeevan-mantra/news/saint-nicholas-decorating-christmas-tree-christmas-2019-who-was-santa-clause-unknown-facts-about-christmas-xmas-tree-xmas-2019-25-december-jesus-and-facts-126345876-126345900.html
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