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जयपुर के मोती डूंगरी में गुजरात से आई मूर्ति, चित्तूर में बढ़ रहा है मूर्ति का आकार, केरल के शिव मंदिर की दीवार पर उभर आई थी गणेश प्रतिमा

आज गणेश चतुर्थी है। घर-घर भगवान गणपति पधारेंगे। साथ ही, इस दिन गणेशजी के मंदिरों में दर्शन करने की भी परंपरा है। कोरोना काल में मंदिरों में दर्शन मुश्किल है। हम आपके लिए लेकर आए हैं 10 ऐसे गणेश मंदिर जो देश के सबसे प्रसिद्ध और प्राचीन हैं।

  • देश के 10 सबसे अमीर मंदिरों में से एक मुंबई के सिद्धिविनायक

महाराष्ट्र के मुंबई का सिद्धिविनायक मंदिर करीब 219 साल पुराना है। देश के सबसे अमीर मंदिरों में ये भी शामिल है, टॉप टेन अमीर मंदिरों में इसका स्थान 6 या 7वीं पायदान पर आता है। इसकी स्थापना 19 नवंबर 1801 को हुई थी। मंदिर के अंदर एक छोटे मंडप में सिद्धिविनायक प्रतिमा है। इसकी छत पर करीब 3.5 किलो का सोने का कलश लगा हुआ है। छत के अंदर की तरफ भी सोने का लेप किया हुआ है। ये मंदिर पांच मंजिला है और करीब 20 हजार वर्गफीट में फैला हुआ है। सिद्धिविनायक की मूर्ति काले पत्थर को तराशकर बनाई हुई है। मूर्ति की सूंड दाहिनी ओर है। मूर्ति के माथे पर एक नेत्र है जो कि शिवजी के तीसरे नेत्र की तरह दिखता है।

  • महारानी के मायके से लाई गई थी जयपुर के मोती डूंगरी मंदिर की मूर्ति

राजस्थान के जयपुर में मोती डूंगरी गणेश मंदिर है। मंदिर की गणेश प्रतिमा 1761 में जयपुर के राजा माधौसिंह की रानी के पैतृक गांव मावली (गुजरात) से लाई गई थी। 1761 से पहले भी इस प्रतिमा का इतिहास 500 सालों से ज्यादा पुराना माना जाता है। मोती डूंगरी गणेश के प्रति जयपुर के लोगों की गहरी आस्था है। गणेश चतुर्थी, नवरात्र, दशहरा और दीपावली पर यहां विशेष उत्सव होते हैं और इस दौरान लोग बड़ी संख्या में नए वाहन लेकर यहां आते हैं और पूजन करवाते हैं। सामान्य तौर पर गणेश उत्सव के दौरान यहां 50 हजार से ज्यादा लोग प्रतिदिन दर्शन करने आते हैं।

  • भक्त दगड़ू हलवाई के नाम से ही जाने जाते हैं यहां गणेश

महाराष्ट्र के पुणे का दगड़ू गणेश मंदिर भी काफी प्रसिद्ध है। इसके निर्माण के संबंध में एक कहानी है कि जब 18वीं शताब्दी में प्लेग महामारी फैली थी, उस समय यहां के एक व्यापारी दगड़ू सेठ हलवाई के बेटे की मौत इस बीमारी की वजह से हो गई थी। इस कारण दगड़ू सेठ और उनकी पत्नी दुःखी रहने लगे थे। तब अपने गुरु माधवनाथ महाराज के कहने पर उन्होंने यहां गणेश मंदिर बनवाया। पहले इसका नाम गणेश मंदिर ही था, लेकिन बाद ये दगड़ू सेठ हलवाई के नाम से ही प्रसिद्ध हो गया। मंदिर में करीब साढ़े फीट ऊंची और चार चौड़ी गणेश प्रतिमा स्थापित है।

  • हर साल इस चित्तूर के कनिपकम मंदिर में कुछ रत्ती बढ़ जाता है गणेश का आकार

आंध्रप्रदेश में चित्तूर जिले के इरला मंडल में कनिपकम गणेश मंदिर है। इस मंदिर को पानी के देवता का मंदिर भी कहा जाता है। तिरुपति जाने वाले भक्त पहले इस मंदिर में गणेश के दर्शन करते है। मंदिर का निर्माण 11वीं शताब्दी में चोल राजा कुलोठुन्गा चोल प्रथम ने करवाया था। इसके बाद विजयनगर के राजा ने 1336 में मंदिर का जीर्णोद्धार कराया। मंदिर की मूर्ति के संबंध मान्यता है कि इसका आकार बढ़ रहा है। हर साल यहां मूर्ति कुछ रत्ती बढ़ जाती है। ये प्रतिमा काले ग्रेनाइट की एक बड़ी चट्टान को ही तराश कर बनाई गई है।

  • केरल के मधुर महागणपति मंदिर में तस्वीर पर उभर आई थी गणेश की मूर्ति

केरल की मधुरवाहिनी नदी के किनारे पर मधुर महागणपति मंदिर स्थित है। इसका इतिहास 10वीं शताब्दी का माना जाता है। उस समय यहां सिर्फ शिवजी का मंदिर था, लेकिन बाद में ये गणेशजी का प्रमुख मंदिर बन गया। मान्यता है कि जब ये शिवजी का मंदिर था, तब यहां पुजारी के साथ उनका बेटा भी रहता था। एक दिन पुजारी के बेटे ने मंदिर की दीवार पर गणेशजी का चित्र बना दिया। कुछ समय बाद चित्र का आकार धीरे-धीरे बढ़ने लगा और चित्र मूर्ति जैसा दिखने लगा। दीवार पर चमत्कारी रूप से उभरी इस प्रतिमा को देखने के लिए लोग आने लगे। दीवार पर उभरी प्रतिमा की वजह से ये शिव मंदिर की जगह भगवान गणेश का मंदिर बन गया।

  • रणथंबोर के चिट्ठी वाले गणेश को रोज मिलती हैं हजारों चिट्ठियां

राजस्थान के सवाई माधौपुर के पास रणथंबोर किले में गणेशजी का एक प्राचीन मंदिर है। इसे त्रिनेत्र गणेश मंदिर कहते हैं। मंदिर में रिद्धि-सिद्धि के साथ गणेशजी की त्रिनेत्र वाली प्रतिमा है। मंदिर का निर्माण 10वीं शताब्दी का है। उस समय राजा हमीर ने इस मंदिर को बनवाया था। रणथंबोर गणेशजी को हर रोज भक्तों की हजारों चिट्ठियां मिलती हैं। भक्त किसी भी शुभ काम की शुरुआत में गणेशजी को चिट्ठी भेजकर आमंत्रित करते हैं। चिट्ठी या कार्ड पर श्री गणेशजी का पता, रणथंबोर किला, जिला सवाई माधोपुर राजस्थान लिखा जाता है और भक्त की चिट्ठी भगवान तक पहुंच जाती है।

  • पुडुचेरी के मनाकुला मंदिर की गणेश प्रतिमा कई बार समुद्र में फेंकने पर भी लौट आई थी

भारत के दक्षिण में पुडुचेरी में मनाकुला विनायगर मंदिर स्थित है। यहां मान्यता प्रचलित है कि सन् 1666 में यहां कुछ फ्रांसीसियों का एक दल आया था, मंदिर का इतिहास उससे भी पहले का है। मंदिर में चित्रों में गणेशजी से जुड़ी कथाएं अंकित की हुई हैं। शास्त्रों में बताए गए गणेश के 16 स्वरूपों के चित्र भी यहां हैं। मंदिर का मुख समुद्र की ओर है। इसीलिए, इसे भुवनेश्वर गणेश भी कहते हैं। कहा जाता है कि फ्रांसीसी लोगों ने इस मंदिर की प्रतिमा को कई बार समुद्र में फेंका, लेकिन हर बार ये प्रतिमा किनारे पर मिलती।

तमिल में मनल का मतलब बालू रेत और कुलन का मतलब सरोवर होता है। पुराने समय में गणेश प्रतिमा के आसपास ढेर सारी बालू रेत थी, इसलिए इन्हें मनाकुला विनायगर गणेश कहा जाने लगा। मंदिर की सजावट में सोने का उपयोग किया गया है।

  • विदेश मंत्रालय के अधिकारी ने बनवाया था गंगटोक का टोक मंदिर

सिक्किम का गंगटोक क्षेत्र बौद्ध धर्म के नजरिए काफी प्रसिद्ध है। लेकिन, यहां एक बहुत खास गणेश मंदिर भी है, जिसे गणेश टोक मंदिर के नाम से जाना जाता है। इस मंदिर का निर्माण करीब 1953 में हुआ था। उस समय भारत के विदेश मंत्रालय में पदस्थ अधिकारी अपा. बी. पंत ने मंदिर बनवाया था। मंदिर के आसपास का क्षेत्र बहुत ही सुंदर है। यहां का प्राकृतिक वातावरण भक्तों के मन को शांति देता है।

  • रिद्धि-सिद्धि के साथ विराजित गणेश के दुर्लभ मंदिरों में से एक है इंदौर का खजराना गणेश मंदिर

मध्य प्रदेश के इंदौर में खजराना गणेश मंदिर स्थित है। मंदिर में गणेशजी की करीब 3 फीट ऊंची प्रतिमा स्थापित है। साथ ही, रिद्धि-सिद्धि भी विराजित हैं। मंदिर का इतिहास काफी पुराना है। प्रारंभ में ये मंदिर काफी छोटा था। 1735 में होलकर वंश की महारानी अहिल्या बाई ने मंदिर को भव्य बनवाया था। इस मंदिर में गणेशजी के साथ ही करीब 30 मंदिर और हैं। ऐसा माना जाता है ये मंदिर कभी तंत्र पूजा का स्थान भी रहा है।

  • मध्य प्रदेश के उज्जैन के चिंतामण मंदिर में भगवान राम के हाथों हुई थी गणेश स्थापना

12 ज्योतिर्लिंगों में से एक महाकालेश्वर ज्योतिर्लिंग से करीब 7-8 किलोमीटर दूर स्थित है चिंतामन गणेश मंदिर। ये मंदिर परमार कालीन है। इसका इतिहास 9वीं-10वी शताब्दी के आसपास का माना जाता है। मंदिर गणेश के तीन स्वरूपों की प्रतिमाएं हैं। इनमें चिंतामन, इच्छामन, सिद्धिविनायक स्वरूप के दर्शन होते हैं। वर्तमान में मंदिर की जो इमारत है, उसका निर्माण होलकर वंश की महारानी अहिल्याबाई द्वारा करवाया गया था। हालांकि, इसका इतिहास रामायण काल से जुड़ा माना जाता है। ऐसी मान्यता है कि यहां तीन गणेश प्रतिमाएं भगवान राम, लक्ष्मण और सीता ने स्थापित की थी। लक्ष्मण ने यहां एक बावड़ी का निर्माण भी किया था, जिसे लक्ष्मण बावड़ी ही कहा जाता है।



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source https://www.bhaskar.com/jeevan-mantra/dharm/news/10-temples-of-lord-ganesh-in-india-moti-dungri-in-jaipur-chittoor-ganesh-siddhivinayak-temple-mumbai-ranthanbore-ganesh-dagdu-ganesh-pune-127638769.html
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Milan Tomic

Hi. I’m Designer of Blog Magic. I’m CEO/Founder of ThemeXpose. I’m Creative Art Director, Web Designer, UI/UX Designer, Interaction Designer, Industrial Designer, Web Developer, Business Enthusiast, StartUp Enthusiast, Speaker, Writer and Photographer. Inspired to make things looks better.

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