जीवन मंत्र डेस्क. भारत के बिहार प्रांत का सर्वाधिक प्रचलित एवं पावन पर्व है सूर्य षष्ठी व्रत। इस व्रत में प्रमुख रूप से भगवान सूर्य की पूजा की जाती है।चार दिनों तक चलने वाला यह पर्व साल में दो बार मनाया जाता है। कार्तिक माह के शुक्ल पक्ष की चतुर्थी तिथि से सप्तमी तक और चैत्र मास में भी इन तिथियों पर ही ये व्रत किया जाता है। इस साल कार्तिक शुक्ल पक्ष षष्ठी यानी 2 नवंबर शनिवार के दिन छठ का महापर्व मनाया जाएगा। इस दिन डूबते हुए सूर्य को अर्घ्य दिया जाएगा और 3 नवंबर रविवार को उगते हुए सूरज को अर्घ्य देकर आराधना की जाएगी।
- सूर्य षष्ठी व्रत
हिंदू कैलेंडर के अनुसार यह व्रत कार्तिक मास की शुक्ल पक्ष की षष्ठी तिथि को किया जाता है। इसलिए इसे सूर्य षष्ठी व्रत भी कहा जाता है। इस व्रत में सायं कालीन प्रथम अर्घ्य से पहले मिट्टी की प्रतिमा बनाकर षष्ठी देवी का आव्हान और पूजन किया जाता है। फिर अगले दिन सुबह सूर्य को अर्घ्य देने से पहले षष्ठी देवी का पूजन कर विसर्जन कर देते हैं। ऐसी मान्यता है कि पंचमी के सायंकाल से ही घर में भगवती षष्ठी का आगमन हो जाता है इसलिए संसार में पर्व सूर्य षष्ठी के नाम से विख्यात है। इस व्रत के पालन से शक्ति और ब्रह्म दोनों की आराधना का फल मिलता है। षष्ठी तिथि का संबंध भी संतान की आयु से होता है।
प्रकृति का छठा अंश होने से षष्ठी देवी नाम पड़ा
- मूल प्रकृति के छठे अंश से यह प्रकट हुई हैं तभी इनका नाम षष्ठी देवी पड़ा है। यह ब्रह्मा जी की मानसपुत्री हैं।षष्ठी देवी शिशुओं की अधिष्ठात्री देवी हैं। जिन्हें संतान नहीं होती, उन्हें यह संतान देती है, संतान को दीर्घायु प्रदान करती है। बच्चों की रक्षा करना भी इनका स्वाभाविक गुण धर्म है। इसलिए षष्ठी व्रत के पालन से संतान की रक्षा होती है।
- यह देवसेना के नाम से भी विख्यात हैं। इन्हें विष्णुमाया तथा बालदा अर्थात पुत्र देने वाली भी कहा गया है। षष्ठी देवी अपने योग के प्रभाव से शिशुओं के पास सदा वृद्धमाता के रुप में अप्रत्यक्ष रुप से विद्यमान रहती हैं। वह उनकी रक्षा करने के साथ उनका भरण-पोषण भी करती हैं।
Download Dainik Bhaskar App to read Latest Hindi News Today
source https://www.bhaskar.com/religion/dharam/who-is-chhath-mata-shashthi-devi-puja-chhathi-mata-also-known-by-devsena-devi-01677085.html
0 comments:
Post a Comment